कृषि विभाग में फर्जीवाड़ा /सरकारी पैसे का जमकर दुरुपयोग/ केंद्रीय एजेंसी से जांच की उठ रही मांग
जिले का कृषि विभाग अपने कारनामों को लेकर हमेशा ही सुर्खियों में बना रहता है. यहां के अधिकारी एक दूसरे का टांग खींचने में मस्त रहते हैं. यहां लंबे समय से पदों को लेकर खो खो भी चलते रहता है. किसानों की फरियाद सुनने वाला कोई नहीं है. अपनी समस्याओं को लेकर किसान कृषि विभाग के चौखट पर नाक रगड़ते हैं पर उपसंचालक एवं उनके अधीनस्थ अन्य अधिकारी अपने कार्यों में मस्त दिखाई देते हैं. हालत यह है कि जिले का कृषि विभाग किसानों की समस्या का निराकरण करने के बजाय उन्हें प्रताड़ित कर रहा है. क्षेत्र के किसानों को अब कृषि विभाग पर भरोसा नहीं रहा. चाहे मामला डब्लूडीटीआर का हो या बीज एवं खाद का या नलकूप खनन या किसी अन्य महत्वपूर्ण योजना का जब तक किसान दलालों के पास नहीं जाएगा उनका काम नहीं होता. आलम यह है कि विभाग में कुछ अधिकारी भी दलाली के कार्य में लगे हैं. वह उन्हीं किसानों को बार-बार फायदा दिलाते हैं जिनसे उनका पुराना नाता हो और जो किसानों को मिलने वाली सब्सिडी को अधिकारियों के साथ मिल बाट कर सके.
डब्ल्यूडीटीआर में एक अधिकारी ने तो सरकारी पैसे का जमकर दुरुपयोग किया किसानों के पैसे को अपने भाई एवं रिश्तेदार तथा कर्मचारियों के खाते में डालकर मौज कर रहा है. इधर किसान दिवाली नहीं माना पा रहे हैं. दूसरी और बड़े राजपुर के किसानों ने धान अंकुरित नहीं होने को लेकर कृषि विभाग के चौखट में दर्जनों बार अपना दुखड़ा रोया पर कृषि विभाग के अधिकारियों का दिल नहीं पसीजा बल्कि वह दुकानदारों एवं बीज कंपनियों से मिलकर उन्हीं के घरों में पिकनिक मनाते रहे. चार महीने बाद भी परिणाम शून्य है बल्कि पेशी पर पेशी बुलाकर घर का बचाखुचा धान भी बेचवा दिया. नलकूप खनन की बात करें तो कुछ किसानों का बी वन खसरा दलाल नुमा अधिकारियों के हाथ में रहता है. जब भी योजना आती है उन्ही बी वन खसरा पर किसानों से कराए गए पूर्व हस्ताक्षर से योजना का लाभ ले लेते हैं. किसानों को फायदा कम होता है दलाल नुमा अधिकारियों को फायदा ज्यादा होता है. कुल मिलाकर स्थिति यह है कि कृषि विभाग के पूरे कार्यों की ईओडब्ल्यू या ईडी से जांच करिने की आवश्यकता महसूस की जा रही है.
